बिहार के युवाओं ने बना दी “जुगाड़ की एंबुलेंस”, जानिए…

ऐसा अक्सर सुनने और पढ़ने को मिलता है। कइयों ने तो खुद अनुभव भी किया होगा कि एंबुलेंस 10 मिनट पहले आ गया होता तो मरीज की जान बच जाती लेकिन क्या हमने ऐसा कभी सोचा है कि दूसरों पर निर्भर करने की वजह से ही हमारे कई काम बिगड़ जाया करते हैं।

ऐसा भी देखा गया है कि जैसे ही इंसान को इस सचाई का एहसास हो जाता है कि उसकी मदद को कोई नहीं आयेगा। उसे रास्ते खुद निकालने होंगे, उसकी सोच उसी दिशा में काम करने लगती है। वह तरकीब ढूंढ़ने लगता है और कोई-न-कोई रास्ता उसे मिल ही जाता है।

तो जानिए गरीब मरीजों को अब एंबुलेंस के लिए सरकारी संसाधनों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। इसके लिए बिहार की राजधानी पटना के 4 युवाओं ने स्लम के लोगों के लिए जुगाड़ एंबुलेंस तैयार किया है। जुगाड़ के इस एंबुलेंस पर ना तो पैसे खर्च करने पड़ेंगे और ना ही ईंधन का कोई टेंशन होगा। इस जुगाड़ एंबुलेंस को 10 मिनट के अंदर तैयार कर आसानी से मरीजों को अस्पताल पहुंचाया जा सकता है और उनकी जान बचाई जा सकती है।

राजधानी पटना के 4 युवाओं शिखा, नुपुर, प्रभाकर और शुभांशु ने गरीबों के लिए जुगाड़ एंबुलेंस का इजाद किया है। इन युवाओं ने शुरुआत राजधानी के स्लम बस्तियों से की है जहां रोज लोगों के बीच जाकर ये ट्रेनिंग देते और उन्हें आपातकाल की स्थिति में एंबुलेंस बनाने का तरीका बताते हैं। कोई अगर बीमार पड़ जाए तो इस एंबुलेंस को झटपट तैयार किया जा सकता है क्योंकि इसे बनाने में सिर्फ 2 साइकिल, रस्सी, तख्ते की जरूरत पड़ती है। कोई भी साइकिल चालक इसे आसानी से चलाकर मरीजों को अस्पताल पहुंचा सकता है।

ट्रेनर कुमारी शिखा ने कहा कई बार ऐसा होता है कि अस्पताल में एंबुलेंस होते हुए भी एंबुलेसवाले मना कर देते हैं। ऐसी परिस्थिति में प्रत्येक स्लम क्षेत्र में साइकिल तो मिल ही जायेगा। साइकिल, बांस और एक पटरे से इस जुगाड़ एंबुलेंस को तैयार किया जा सकता है। दो लोगों के को-ऑर्डिनेशन से यह साइकिल चलती है। इस माध्यम से मरीज को अस्पताल पहुंचाया जा सकता है।

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एक अन्य ट्रेनर नुपुर सिन्हा ने कहा कि हम पटना के 10 शहरी स्लम क्षेत्रों में यह काम कर रहे हैं। वहां के बच्चे-बच्चियों को सशक्त कर रहे हैं ताकि उनके घर में अगर कोई बीमार है तो वे वक्त जाया किये बिना साइकिल का प्रयोग करते हुए एंबुलेंस बना कर मरीज को हॉस्पिटल तक पहुंचा सकें। नुपुर ने आगे कहा कि बिहार भर में जितनी भी स्लम बस्तियां हैं वहां के लोगों तक वे इस जुगाड़ एंबुलेंस को पहुंचाना चाहती हैं।

शिखा और नुपुर रोज नई स्लम बस्तियां जाती हैं जहां वे सिर्फ पुरुषों के बीच ही ट्रेनिंग नहीं देती बल्कि महिलाओं को भी एंबुलेंस तैयार करने का तरीका सिखाती हैं। सबसे अच्छी बात ये है कि जुगाड़ का ये एंबुलेंस सायरन युक्त होता है जो सस्ते दरों में आसानी से खरीदा जा सकता है। इन युवा-युवतियों का लक्ष्य है कि सूबे के तमाम स्लम बस्तियों में जाकर ये लोगों को जुगाड़ एंबुलेंस बनाने की ट्रेनिंग दें और इस तरह मरीजों की जान बचाने का काम कर पायें।

ट्रेनर प्रभाकर कुमार ने कहा कि हाल ही में उड़ीसा के दाना मांझी के साथ जो घटित हुआ उसे ही ध्यान में रखते हुए हम पटना के दस स्लम क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। (याद दिला दूं कि दाना मांझी को एंबुलेंस नहीं मिला था और उन्हें अपनी पत्नी की लाश अकेले ही कंधे पर ढोनी पड़ी थी) हमारा प्रयास है कि हम उन्हें बताएं कि सरकारी मदद के भरोसे न रह कर घर में ही मौजूदा संसाधनों से कैसे एंबुलेंस, स्ट्रेचर बनाया और मरीज को अस्पताल ले जाया जा सकता है।

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