बिहार की बेटी गरिमा ने गरीब बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन देने के लिए छोड़ दी लाखों की नौकरी

गरिमा ने देश के प्रख्यात मैनेजमेंट संस्थान IIM से MBA की पढ़ाई की। फिर देश की नंबर वन आईटी कंपनी Infosys की नौकरी छोड़ दी। पता है क्यों..? क्योंकि उसे अपने होम टाउन (बिहार के मुजफ्फरपुर) के गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोलना था। हैरत हुई न जानकर कि IIM की एक ग्रैजुएट Infosys की नौकरी छोड़ बिहार के मुजफ्फरपुर में स्कूल क्यों खोलने गयी। बस इसीलिए कि आईआईएम लखनऊ की पास आउट गरिमा विशाल को अपनी मातृभूमि से प्यार था। उसने अपने यहां के गरीब बच्चों को भी क्वालिटी एजुकेशन देने की ठानी थी।

मूल रूप से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली 28 वर्षीय गरिमा विशाल ने गरीब बच्चों के लिए एक खास तरह का स्कूल खोला है। खास बात ये है कि उन्होंने ये स्कूल अपनी अच्छी-भली और चमकदार नौकरी को छोड़ खोला है। स्कूल का नाम है “DEJAWOO SCHOOL OF INNOVATION“। अपनी तरह के खास किस्म के इस स्कूल की व्यवस्था ऐसी है कि उसमें किसी भी बैकग्राउंड वाले बच्चे पढ़ाई कर सकते हैं। फिलहाल इस स्कूल में प्राइमरी के 100 बच्चे पढ़ रहे हैं। स्कूल के लिए बुनियादी ढांचे की लागत गरिमा के सास-ससुर वहन करते है। स्कूल में अभी 800 रुपये प्रति माह शुल्क लगता है, जो माता-पिता की वित्तीय स्थिति पर विचार करके कम हो जाता है और एक मामूली शुल्क लेता है।

ये सब कैसे शुरू हुआ
गरिमा विशाल बताती हैं कि इसकी शुरुआत साल 2011 में भुवनेश्वर से ही हुई थी। जब वो इन्फोसिस में कार्यरत थी। कहती हैं कि मैं जहां रहती थी, वहीं के पड़ोस के कुछ गरीब बच्चे मिले, जो आजतक कभी स्कूल नहीं गए। बच्चे गुजराती समुदाय के थे, गरीब थे। उनके अभिभावक माली हालत के कारण अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिला नहीं सकते थे। लेकिन, सरकारी स्कूलों में उड़िया माध्यम होने के कारण वहां भी दाखिला नहीं मिल सका था। उन बच्चों को जुटाकर मैंने अंग्रेजी, गणित और हिन्दी की ट्रेनिंग देनी शुरू की। हर शाम को क्लास लगता। करीब 30 बच्चे पढ़ने आते थे। बाद में मेरा तबादला हो गया, लेकिन उसके पहले उन बच्चों को इतना तैयार कर दिया था कि उन्हें किसी भी अंग्रेजी स्कूल में दाखिला मिल जाए। स्कूल वालों से बात कर कम फीस के साथ खुद ही दाखिला भी दिलाया था।

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“Dejawoo School of Innovation”
भुवनेश्वर से तबादला होने पर गरिमा में दोबारा नौकरी ज्वाइन नहीं की। अब तो मातृभूमि ने बुला लिया था। सबकुछ छोड़ मुजफ्फरपुर चली आईं। अपने दोस्तों और खुद से बहुत रिसर्च किया। आज की शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल की। लोगों को जागरूक किया। इसके बाद आईडिया आया DEJAWOO SCHOOL OF INNOVATION का।

गरिमा कहती हैं स्कूल का ये आईडिया शिक्षा व्यवस्था के तीनों पिलरों यानी स्कूल, बच्चे और अभिभावकों पर काफी रिसर्च करके आया है। स्कूल के नाम में DEJAWOO का मतलब होता है एक ऐसी जगह जहां पहले का अनुभव हो। माने ये कि स्कूल के बच्चों को ऐसा लगता हो कि उस जगह पर ये पहले भी गए हों। ये उनका घर भी हो सकता है।

टीचर्स की टीम भी अनूठी
गरिमा के इस इनोवेटिव स्कूल में टीचर्स की टीम भी अनूठी हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए उन महिलाओं को लिया गया है, जो काफी शिक्षित होने के बावजूद अपने ससुराल को संभाल रही हैं। या फिर वैसी युवतिया हैं, जो पढ़ी-लिखी तो हैं, मगर परिवार उन्हें बाहर रहकर जॉब करने की इजाजत नहीं देता। इन टीचर्स को लेने के बाद पहले इन्हें ट्रेन किया जाता है। फिर हर हफ्ते उनका टेस्ट भी होता है। नए टिप्स दिए जाते हैं।

टीचर्स में डॉक्टरों की टीम भी शामिल है। ये डॉक्टर गरिमा की जान-पहचान के हैं। उनका मुख्य काम अभिभावकों को बच्चे के लिए ट्रेंड करना है। क्योंकि बच्चे ज्यादातर समय घर पर ही बिताते हैं। गरिमा बताती हैं कि स्कूल में बच्चों को पढ़ा देने भर से कुछ नहीं होता। असली पढ़ाई तो घर में होती है।

मेरे पिता ने मुझे उच्च शिक्षा लेने के लिए प्रेरित किया। इंजीनियरिंग के बाद मैनेजमेंट पढ़ने का भी अवसर मिला। मातृभूमि के लिए कुछ करना चाहती थी। शायद यही वजह थी कि मुझे भुवनेश्वर जैसी जगह में नौकरी करने का भी अवसर मिला। अब तो ससुराल के लोग भी काफी प्रोमोट कर रहे हैं। उनका साथ है। सपना बिहार के हर जिले में इस तरह का स्कूल खोलने का है। – गरिमा

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