ये हैं ‘लावारिसों’ के सेंटा क्लॉज : जो अंतिम सफर तक देते हैं उनका साथ

कोई जरूरी नहीं कि सेंटा क्लॉज लाल कपड़े और सफेद दाढ़ी में ही दिखाई दें। ये भी जरूरी नहीं कि सेंटा के लिए क्रिसमस का इंतजार करना पड़े। हमारे समाज भी कई ऐसे लोग हैं, जो किसी ‘सेंटा क्लॉज’ से कम नहीं है। उन्हीं में से एक बिहार की राजधानी पटना के मछुआटोली में रहने वाले विजय को लोग लावारिसों का मसीहा कहते हैं। विजय ने लावारिसों की सेवा को ही अपना धर्म बनाया हुआ है। किसी भी लावारिस लाश का पता चलने पर विजय उस लाश का पूरे रीति रिवाज के साथ अंतिम संस्कार करवाते हैं। उनका कहना है, ‘लावारिसों की सेवा करना मेरा फर्ज है और मैं उसी फर्ज को निभा रहा हूं।’ विजय पीएमसीएच में आने वाले सभी लावारिसों की सेवा करते हैं।

विजय का कहना है कि पीएमसीएच में कई ऐसे लोग आते हैं जिनका कोई नहीं होता। अस्पताल में उन लोगों की ठीक से देख-रेख नहीं होती है। वे सड़को पर ऐसे ही पड़े रहते हैं, मुझे यह देखकर अच्छा नहीं लगता था इसलिए मैंने फैसला किया कि मुझे इनकी सेवा करनी चाहिए।

विजय पीएमसीएच में लावारिसों की सेवा से लेकर उनके खाने और कपड़ों आदि सभी चीजों का इंतज़ाम अपने पैसों से करते हैं। इसके साथ ही विजय की कोशिश रहती है कि वे ऐसे लोगों को उनके घरवालों से भी मिलवाएं।

पिछले 31 सालों से कर रहें लावारिसों की सेवा
1985 की बात है जब विजय की नजर पीएमसीएच में जमीन पर एक औरत की लाश पर पड़ी थी। उन्हें पता चला कि इस औरत का अंतिम संस्कार बिना किसी रीति रिवाज के साथ ही पूरा कर दिया जाएगा। बस इसके बाद क्या था, विजय ने अस्पताल से उस औरत के अंतिम संस्कार की अनुमति मांगी और पूरे रीति रिवाज के साथ उनका अंतिम संस्कार करवाया। उन्हें पहले तो अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं मिली थी, उन्हें बस इतना कहा गया कि इस औरत के जलने के समय वो घाट पर जा सकते हैं। विजय ने बताया कि मैंने पूरे रीति रिवाज के साथ उस औरत का अंतिम संस्कार करवाया था। बस यहीं से यह सिलसिला आगे चल पड़ा। अब न सिर्फ पीएमसीएच में ही बल्कि शहर के किसी भी कोने में लावारिस लाश का पता चलते ही बिना किसी देरी के विजय उसका अंतिम संस्कार करने पहुंच जाते हैं।

मृत समझ चुके आदमी को बचाया कुछ इस तरह
विजय का कहना है कई बार ऐसा भी होता है कि कोई लावारिस आदमी सड़क पर जिंदा लाश की तरह पड़ा रहता है। लोग उसे मृत समझ लेते हैं। उन्होंने एक घटना के बारे में बताते हुए कहा कि एक बार सड़क पर पड़े एक आदमी को इसी तरह मृत समझ लिया गया था। उसे जलाने के लिए ही ले जाया जा रहा था, लेकिन पता नहीं मुझे क्यों ऐसा लगा कि वो जिंदा है और मेरा शक सच भी निकला। बाद में उसकी सेवा होने से वह ठीक हो गया। वह राजस्थान का निवासी था, जिसे कुछ गुण्डों ने लुट लिया था। बाद में उसके घर वालों का पता करके उनको जानकारी दी गई।

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कई रूप में करते हैं लोगों की मदद
सिर्फ लावारिसों के लिए ही नहीं बल्कि और भी कई रूपों में विजय लोगों की मदद करते हैं। विजय ने बताया कि 2005 में कश्मीर में आए भूकंप के समय पाकिस्तान में भी काफी नुकसान हुआ था। इस आपदा में पाकिस्तान में भी 79,000 लोगों की जानें गई थी। विजय ने उस समय ना सिर्फ भारत बल्कि पाकिस्तान में आपदा के पीड़ितों की मदद की थी। उन्होंने उस समय अकेले अपने घर से 36 खाने के सामान की बोरियां पाकिस्तान भेजवाई थीं। खाने का सारा समान उनके घर की औरतों ने ही बनाया था।

लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के लिए मिल चुकी है आधिकारिक मान्यता
बिहार सरकार ने विजय को लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार की आधिकारिक मान्यता दे दी गई है। इसके लिए विजय को पैसे भी ऑफर किए गए थे, मगर उन्होंने पैसे लेने से इंकार कर दिया और मुफ्त में ही लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करते हैं।

पीएमसीएच में इनके संघर्ष से ही बना लावारिस वार्ड
आज विजय की वजह से ही पीएमसीएच में लावारिसों के लिए एक अलग वार्ड भी बन चुका है। लावारिसों के प्रति विजय की सेवा भावना देखने के बाद ही पीएमसीएच में 2013 में लावारिस वार्ड खोला गया था और इसकी देखभाल का जिम्मा भी विजय को ही दिया गया था। आज भी वे यहां निशुल्क सेवा दे रहे हैं।

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