यहां 14 अगस्त की मध्यरात्रि को फहराया जाता है तिरंगा, …जानिए

देश में दो ऐसी जगह पहला बाघा बॉर्डर और दूसरा बिहार के पूर्णिया का झंडा चौक जहां पर सबसे पहले आजादी का जश्न मनाया जाता है।

दरसल बिहार के पूर्णिया का झंडा चौक व बाघा बार्डर पर 14 अगस्त की मध्य रात्रि को ही 12 बजकर एक मिनट पर आजादी के जश्न में तिरंगा फहराया जाता है। यह परंपरा वर्ष 1947 से ही चली आ रही है।

मध्य रात्रि को तिरंगा फहराने की प्रथा अंग्रेजों के बंधन से मुक्त होने की घोषणा के खुशी में शुरू हुई थी। 14 अगस्त की मध्य रात्रि को जब आजादी का एलान किया गया था, उसी रात यहां पहली बार तिरंगा फहराया गया था। 70 सालों से उस परंपरा का पालन आज भी यहां किया जा रहा है।

बिहार के पूर्णिया में उस वक्त स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी शमसूल हक, डॉ. लक्ष्मी नारायण सुधांशु, नरेंद्र प्रसाद स्नेही सहित दर्जन से अधिक राष्ट्रभक्त स्वतंत्र झंडा चौक पर दोपहर से ही जमा थे तथा ट्रांसमिशन के जरिए पल-पल की खबर सुन रहे थे। उसी दौरान रात्रि में 12 बजकर एक मिनट पर स्वतंत्र भारत की घोषणा हुई जिसे रेडियो पर प्रसारित किया गया।

भारत के आजाद होने का संदेश सुनते ही सभी सेनानी खुशी से झूम उठे तथा भारत माता की जयघोष करने लगे। उसी वक्त सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने झंडा चौक पर तिरंगा फहराकर आजादी का जश्न मनाया। उसके बाद से हर 14 अगस्त की रात्रि को यहां तिरंगा फहराने की परंपरा का निर्वहन होता आ रहा है।

स्वतंत्रता सेनानी नरेंद्र स्नेही के पुत्र दिनकर स्नेही बताते हैं कि 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को जब पहली बार झंडा चौक पर तिरंगा फहराया गया था तो उस वक्त स्वतंत्रता सेनानी शमसुल हक ने अहम योगदान दिया था।

उस वक्त के स्वतंत्रता सेनानियों में सबसे अधिक दिन तक शमसुल हक जीवित रहे। जब तक वे जीवित रहे हर 14 अगस्त की रात्रि को झंडा चौक पर तिरंगा लहराने की अगुवाई वे स्वयं करते रहे। 15 वर्ष पूर्व उनकी मौत हो गई लेकिन आज भी वह परंपरा कायम है।

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