विश्लेषण: नीतीश की ‘घर वापसी’ की खबर में कितना दम

नोटबंदी के बाद नीतीश कुमार ने नए सेनाध्यक्ष की बहाली को लेकर भी केंद्र सरकार के पक्ष का समर्थन कर दिया। इससे पहले जेडीयू के महासचिव केसी त्यागी ने सेनाध्यक्ष पद पर बिपिन रावत की नियुक्ति की आलोचना की थी। नीतीश के ऐसा करते ही राजनीतिक हलकों में जेडीयू में मतभेद और नीतीश कुमार के एनडीए में जाने की अफवाह एक बार फिर से शुरू हो गई।

दरअसल केसी त्यागी उस समय की घटना भूल गए थे जब मनमोहन सरकार के समय तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह को लेकर विवाद हुआ था। तब एक जेडीयू नेता ने जनरल सिंह की सेनाध्यक्ष पद से बर्खास्तगी तक की मांग कर दी थी। नीतीश कुमार तब भी उस तरह के बयान से सहमत नहीं थे। उस जेडीयू नेता को अपना बयान वापस लेना पड़ा था। इस बार भी नीतीश कुमार ने कहा कि सेना और न्यायपालिका को विवादों से परे रखना चाहिए।

नोटबंदी को लेकर नीतीश कुमार पहले दिन से ही मोदी सरकार के मूल फैसले के पक्ष में रहे हैं। नीतीश का एतराज सिर्फ इस बात को लेकर रहा है कि सरकार ने आम लोगों की कठिनाईयों का ध्यान पहले से नहीं रखा।

एनडीए गठबंधन में जाने का कोई सवाल नहीं
नोटबंदी के फैसले के समर्थन के बाद उड़ रही अफवाहों के बीच नीतीश कुमार ने लेखक (वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर) को बताया था कि उनके एनडीए में जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। उन्हें इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि कुछ जिम्मेदार पत्रकार भी अफवाहों के प्रभाव में आ जाते हैं। दरअसल नीतीश के अफवाहों में आने के कारण भी रहे हैं। कारण है नीतीश कुमार की राजनीति करने की अलग शैली।

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अन्य ज्यादातर दल अपने राजनीतिक विरोधियों के सारे गलत-सही कामों की इन दिनों आलोचना करते रहते हैं। नरेंद्र मोदी सरकार की सराहना करने में अधिकतर दलों को विशेष खतरा दिखता है। उन दलों और नेताओं को यह लगता है कि उससे एक खास वोट बैंक उनसे बिदक जाएगा। नीतीश कुमार उन लोगों से अलग हैं। इतना कि उन्होंने ने पीओके में सेना के सर्जिकल स्ट्राइक का भी समर्थन किया था।
जिस कांग्रेस सरकार ने 1983 में जनरल एसके सिन्हा की वरीयता को दरकिनार करके एएस वैद्य को सेनाध्यक्ष बना दिया था, उसी कांग्रेस के नेता मनीष तिवारी ने सेनाध्यक्ष के रूप में बिपिन रावत की नियुक्ति का कड़ा विरोध किया है।

अनेक लोग खास कर मीडिया का बड़ा हिस्सा ऐसे अंध-विरोध का अभ्यस्त भी चुका है हो। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आए दिन लीक से हटकर अपनी राजनीतिक लाइन लेते रहते हैं। ऐसा एक मौका 2012 में भी आया था। तब भाजपा के समर्थन से नीतीश कुमार सरकार चला रहे थे। पर, जेडीयू ने राष्ट्रपति के चुनाव में यूपीए के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को वोट दे दिये थे।

मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री काल के दौरान नीतीश ने जीएसटी का समर्थन कर दिया। लेकिन दूसरी जेडीयू की सहयोगी पार्टी बीजेपी ने जीएसटी विधेयक को पास नहीं होने दिया था।

वैसे तो नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि 2020 तक बिहार का महागठबंधन कायम रहेगा। याद रहे कि विधानसभा का अगला चुनाव उसी साल होना है।

लेकिन राजनीति में कब कौन सा भूकंप आ जाएगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। पर राजनीति के जानकारों के अनुसार नीतीश सरकार सिर्फ इसलिए नहीं गिर जाएगी क्योंकि मुख्यमंत्री कभी-कभी केंद्र सरकार के अच्छे कामों की तारीफ या समर्थन कर देते हैं।

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कांग्रेस महागठबंधन की शांत पार्टनर
कांग्रेस बिहार के महागठबंधन की एक शांत पार्टनर है। जबकि आरजेडी और जेडीयू के बीच शीत-युद्ध और अंदरुनी अशांति की स्थिति कभी-कभी दिख भी जाती है। ऐसा दोनों दलों की परस्पर विरोध राजनीतिक शैलियों के कारण है, इसके बावजूद दोनों दल अपनी-अपनी मजबूरियों के कारण आपस में मिले थे।

मजबूरियां अभी भी बनी हुई हैं। सन 2019 के लोकसभा चुनाव या फिर 2020 के विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन के दलीय समीकरण में किसी तरह के परिवर्तन की भविष्यवाणी करना जल्दीबाजी होगी। वैसे राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता।
(हिंदी फर्स्ट पोस्ट से साभार लेखक: वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर)

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