विश्वकर्मा ने बनाया था बिहार का यह सूर्य मंदिर, दर्शन से पूरी होती मनोकामनाएं

बिहार के औरंगाबाद जिले का देव सूर्य मंदिर सूर्योपासना के लिए सदियों से आस्था का केंद्र बना हुआ है। ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से विश्व प्रसिद्ध त्रेतायुगीन इस मंदिर परिसर में प्रति वर्ष चैत्र और कार्तिक माह में महापर्व छठ व्रत करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है। पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर की अभूतपूर्व स्थापत्य कला इसकी कलात्मक भव्यता दर्शाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया।

देव का सूर्य मंदिर राज्य की धरोहर एवं अनूठी विरासत है। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

एतिहासिकता व निर्माण को लेकर प्रचलित हैं ये कहानियां
देव के सूर्य मंदिर के निर्माण को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। इनमेें कौन सही है, इस विवाद में नहीं पड़ते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि मंदिर अति प्राचीन है। धर्मग्रंथों में इसकी चर्चा है इससे लोगों की आस्था जुड़ी हुई है।

कहते है भगवान विश्वकर्मा ने बनाया इस मंदिर को
कहा जाता है कि इस मंदिर को कोई साधारण शिल्पी ने नहीं बल्कि इसका निर्माण खुद देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों से किया है।

यहां देव माता अदिति ने की थी पूजा
मंदिर को लेकर एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी।
कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया।

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कुष्ठ रोग ठीक होने पर राजा ऐल ने बनवाया मंदिर
मान्यता है कि सतयुग में इक्ष्वाकु के पुत्र व अयोध्या के निर्वासित राजा ऐल एक बार देवारण्य (देव इलाके के जंगलों में) में शिकार खेलने गए थे। वे कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। शिकार खेलने पहुंचे राजा ने जब यहां के एक पुराने पोखर के जल से प्यास बुझायी और स्नान किया, तो उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। वे इस चमत्कार पर हैरान थे।

बाद में उन्होंने स्वप्न देखा कि त्रिदेव रूप आदित्य उसी पुराने पोखरे में हैं, जिसके पानी से उनका कुष्ठ रोग ठीक हुआ था। इसके बाद राजा ऐल ने देव में एक सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। उसी पोखर में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु व शिव की मूर्तियां मिलीं, जिन्हें राजा ने मंदिर में स्थान देते हुए त्रिदेव स्वरूप आदित्य भगवान को स्थापित कर दिया। इसके बाद वहां भगवान सूर्य की पूजा शुरू हो गयी, जो कालांतर में छठ के रूप में विस्तार पाया।

इस स्थल पर गिरा था सूर्य का टुकड़ा
देव के बारे में एक अन्य लोककथा भी है। एक बार भगवान शिव के भक्त माली व सोमाली सूर्यलोक जा रहे थे। यह बात सूर्य को रास नहीं आयी। उन्होंने दोनों शिवभक्तों को जलाना शुरू कर दिया। अपनी अवस्था खराब होते देख माली व सोमाली ने भगवान शिव से बचाने की अपील की। फिर, शिव ने सूर्य को मार गिराया।

सूर्य तीन टुकड़ों में पृथ्वी पर गिरे। कहते हैं कि जहां-जहां सूर्य के टुकड़े गिरे, उन्हें देवार्क, लोलार्क (काशी के पास) और कोणार्क के नाम से जाना जाता था। यहां तीन सूर्य मेदिर बने। देव का सूर्य मंदिर उन्हीं में से एक है।

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देवयानी के नाम पर पड़ा नाम
एक अनुश्रुति यह भी है कि इस जगह का नाम कभी यहां के राजा रहे वृषपर्वा के पुरोहित शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के नाम पर देव पड़ा था।

प्राचीन काल में हुआ निर्माण
मंदिर के नामकरण व निर्माण को लेकर अनुश्रुतियां अपनी जगह हैं, पुरातात्विक प्रमाण भी इसकी प्राचीनता की ओर इशारा करते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख से ज्ञात होता है कि त्रेतायुग के राजा एेल ने इसका निर्माण कराया था। पुरातत्व विभाग इसकी शिल्प कला को ‘सोलंकी शैली’ का मानता है। शिल्प कला से स्पष्ट होता है कि यह 600 से 1200 ई. के बीच हुआ है।

मंदिर की शिल्प कला, डालते हैं एक नजर…
नक्काशीदार पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह सूर्य मंदिर दो भागो में है। पहला भाग गर्भ गृह है, जिसके ऊपर कमलनुमा शिखर बना है। दूसरा भाग सामने का मुख मंडप है, जिसके ऊपर पिरामिडनुमा छत है। ऐसा नियोजन नागर शैली की प्रमुख विशिष्टता है। उड़ीसा के मंदिरो में अधिकांश शिल्प कला इसी प्रकार की है।

हालांकि, उडि़सा के मंदिरो की तरह गर्भगृह की बाहरी भाग में रथिकाओं का नियोजन देव सूर्य मंदिर में नही है। देव मंदिर के मुख्य मंडप के दोनो पार्श्वों में बने छज्जेदार गवाक्ष आंतरिक एवं ब्राह्य भाग में संतुलन स्थापित करते हैं। ऐसा निर्माण विकसित कोटि के मंदिरों मे ही देखा जाता है।

देव मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त शिल्प कला उड़ीसा के भुवनेश्र्वर मंदिर व मुक्तेश्र्वर मंदिर में नजर आती है। देव मंदिर में जाने के लिए सामान्य ऊंचाई की सीढि़यां तय कर मुख मंडप मे प्रवेश किया जाता है। मुख मंडप आयताकार है, जिसकी पिरामिडनुमा छत को सहारा देने के लिए विशालकाय पत्थरों को तराशकर बनाया गया स्तंभ हैं।

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गर्भगृह में स्थापित हैं प्राचीन प्रतिमाएं
मंदिर के गर्भ गृह में भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के रुप में विराजमान हैं। मंदिर मे स्थापित प्रतिमाएं प्राचीन हैं। मंदिर का सर्वाधिक आकर्षक भाग गर्भगृह के ऊपर बना कमलनुमा शिखर है, जिसपर चढ़ पाना असंभव है।

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