मिलिए ‘सदाबहार’ सेंटा क्लॉज से, पूरे साल अनोखे ‘गिफ्ट देकर लौटाते खुशियां

कोई जरूरी नहीं कि सेंटा क्लॉज लाल कपड़े और सफेद दाढ़ी में ही दिखाई दें। ये भी जरूरी नहीं कि सेंटा के लिए क्रिसमस का इंतजार करना पड़े। हमारे समाज भी कई ऐसे लोग हैं, जो किसी ‘सेंटा क्लॉज’ से कम नहीं है। इनकी सबसे खास बात यह है कि ये बिना किसी मदद की आस में गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा कर रहे हैं। ये सदाबहार सेंटा क्लॉज पूरे साल लोगों में खुशियां बांटते हैं। पढि़ए ये रिपोर्ट…

उन्हीं में से कुछ बिहार की राजधानी पटना के…
सबकी एक मां ‘सुमन’
‘प्रयास भारती’ संस्था की सुमन लाल भी किसी संता से कम नही हैं। वह उन बच्चों की मां बन कर बन कर समाने आती हैं, जिनको किसी कारण से समाज अपना नहीं पाता हैं। ये एक पालना घर भी चलाती हैं। इसमें बच्चों को रखा जाता है। जो भी इच्छुक परिवार होते हैं वो यहां से बच्चों को गोद ले सकते हैं। सुमन 30 वर्षों से समाजसेवा कर रही हैं।

छोटी उम्र की बड़ी सदब
सदब की उम्र सिर्फ 25 साल है, मगर वह काम बहुत बड़ा कर रही है। सदब गरीब बच्चों के लिए काम करती हैं। ऐसे बच्चे जिनके पास न खाने के लिए भोजन है और न पहनने के लिए कपड़े। सदब घर-घर जाकर कपड़े इकट्ठा करती हैं, फिर उन्हें गरीबाें में बांटती हैं। वे ऐसे परिवारों की मदद भी करतीं हैं, जिनके पास कोई बच्चा नहीं है। वे कोशिश करती हैं कि नि:संतान दंपती बच्चा गोद ले भी तो वह लड़की हो।

मनीष हैं किसानों के सेंटा
किसान हैं, तो अन्न हैं और अन्न हैं तो हम। हाल के दिनों में किसानों की बदहाली चर्चा में रही है। इसको देखते हुए आइआइटी खडग़पुर के छात्र रहे मनीष अपनी नौकरी छोड़कर आगे आए हैं। उन्होंने एक कंपनी खोली है, जो किसानों की मदद करती है। कंपनी बताती है कि किस मौसम में कौन की फसल ज्यादा होगी। कंपनी गरीब किसानों को मुफ्त में बीज भी उपलब्ध कराती है।

पढ़े :   बिहार में भाई-दूज की अनोखी परंपरा, ....जानिए क्यों बहनें भाई को खिलाती हैं बजरी

उषा देती हैं बच्चों को मुफ्त शिक्षा
गरीबों के बच्चे पैसे के अभाव में स्कूल नहीं जा पाते। जो जाना चाहते भी हैं, उन्हें रास्ता नहीं सूझता। शहर की उषा ऐसे बच्चों को मुफ्त शिक्षा देती हैं। उन्होंने ऐसे बच्चों के लिए पांचवीं तक का एक स्कूल (राम जतन मेमोरियल स्कूल) खोला है। बाद में इन बच्चों का एडमिशन सरकारी स्कूलों में करा दिया जाता है। अगर फिर भी परिवारवाले फीस देने के लिए राजी नहीं होते हैं, तो उन बच्चों का फीस भी उषा का ट्रस्ट देती है।

शिवानी बांटतीं सबका दर्द
किसी अपने का दुख तो हम सब बांटते हैं। पर, दूसरे का दुख अपना समझना बड़ी बात होती हैं। कुछ ऐसी ही हैं, शिवानी प्रिया। वे बाल अधिकार के लिए काम करती हैं। अगर कोई किसी बच्चे को अस्पताल में छोड़ कर चला जाता हैं, तो शिवानी उसकी पूरी जिम्मेदारी लेती हैं। वे गरीबों के लिए ब्लड कैंप भी लगाती हैं, ताकि पैसों के अभाव में किसी गरीब की मौत खून की कमी से न हो जाए।

निक्की चलातीं मिनी स्कूल
पटना के दानापुर के स्लम एरिया में कचरा चुनने वाले बच्चों के लिए निक्की झा किसी मसीहा की तरह हैं। वे रोज सुबह और शाम अपने घर के बाहर स्कूल चलाती हैं। जो बच्चे किसी काम में लगे होने के कारण दिन में नहीं आ पाते, वे शाम में आकर यहां पढ़ते हैं।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

error: Content is protected !!