बिहार का ये ‘दृष्टिहीन’ शिक्षक 20 साल से बच्चों के बीच बांट रहा है ज्ञान का उजाला

बिहार के पूर्णिया के दृष्टिहीन दिव्यांग शिक्षक निरंजन झा दृष्टिहीन होने के बावजूद बच्चों में शिक्षा की अलख जगाकर समाज के लिये एक मिशाल पेश कर रहे हैं और इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं “अगर हौसले बुलंद हो तो हर मंजिल आसान होती है।”

शहर के गुलाबबाग शनिमंदिर मुहल्ला में टीन के शेड में गरीबी का दंश झेल रहे 40 वर्षीय दिव्यांग निरंजन झा आज किसी पहचान के मुहताज नहीं हैं।

लोग निरंजन को मास्टर साहब के नाम से सम्मान के साथ पुकारते हैं। दरअसल बचपन में ही निरंजन के दोनों आंखो की रोशनी चली गयी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी अपने बुलंद हौसले के कारण उसने कुछ करने की ठान ली। निरंजन का कहना है कि उन्होंने लुई ब्रेल की कहानी से प्रेरणा ली और ब्रेल लिपि से पढ़ना सीखा। कुछ दिनों तक तो उन्होंने एक स्कूल चलाया लेकिन बाद में घर पर ही ट्यूशन पढ़ाने लगे।

खुद गरीबी का दंश झेलने के बावजूद वे अनाथ और गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाते हैं। सरकार की तरफ से उन्हें सिर्फ दिव्यांगता पेंशन मिल रही है। निरंजन की बहू शिवानी झा का कहना है कि निरंजन झा बचपन से दिव्यांग होने के बावजूद अपना सारा काम खुद कर लेते हैं। पढ़ाने के अलावा वे रेडियो भी खुद ठीक करते हैं।

निरंजन झा से पढ़ने वाले छात्रों का भी कहना है कि सर दिव्यांग और दृष्टिहीन होने के बावजूद भी काफी अच्छा पढ़ाते हैं। वे गणित और विज्ञान के कठिन सवाल को भी आसानी से हल कर लेते हैं।

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बचपन से दृष्टिहीन होने के बावजूद निरंजन झा ने अपने अदम्य हौसले के बदौलत समाज में सम्मान के साथ जीना सीखा है।

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