इस शख्स ने देसी जुगाड़ तकनीक से निकाली लाशें, एनडीआरएफ जवानों ने भी माना लोहा

पटना में एनआईटी घाट पर मकर संक्रांति के दिन नाव दुर्घटना में के बाद सबसे बड़ी चुनौती लाशों को निकालने की थी। गोताखोर राजेंद्र सहनी अपने 15 साथियों के साथ रविवार की सुबह छह बजे घाट पर आ डटे। सात बजे से सर्च ऑपरेशन शुरू किया। गोताखोरों ने चार शव निकाले। इससे पहले शनिवार की शाम में 21 शव निकाले गए थे। सारे शव गोताखोरों ने ही निकाले।

देसी जुगाड़ से गंगा से निकाली लाश
सर्च ऑपरेशन में एनडीआरएफ व एसडीआरएफ की टीम भी लगी हुई थी। चार शव निकलने के बाद सर्च ऑपरेशन की कमान एनडीआरएफ ने संभाली। जवान ऑपरेशन चलाते रहे लेकिन एक भी बॉडी हाथ नहीं लगी। हाईटेक तकनीक से लैस एनडीआरएफ जवानों ने भी राजेंद्र साहनी की देसी तकनीक का लोहा माना।

मामूली बंसी का होता है इस्तेमाल
राजेंद्र कहते हैं कि देसी तकनीक से ही 20 वर्षों से बचाव कार्य कर रहा हूं। नए-नए लड़कों को प्रशिक्षण देता हूं। स्थानीय गोताखोर शवों को बाहर निकालने के लिए बंसी, प्लास्टिक की रस्सी और ईंट का इस्तेमाल करते हैं। काफी तेज नोक वाली इस बंसी के संपर्क में आते ही कोई भी चीज फंस जाती है। 50 से साठ की संख्या में बंसी को पतली सी प्लास्टिक की रस्सी से बांधा जाता है। बीच-बीच में ईंट का टुकड़ा भी बांध कर नदी में डाला जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे नाव रस्सी को खींचती है। यह प्रक्रिया बार-बार दुहराई जाती है। बंसी में जैसे ही कोई भारी चीज फंसती है गोताखोरों को जानकारी मिल जाती है। इसके बाद उसे निकालते हैं।

बालूघाट सुल्तानगंज के हैं रहने वाले
राजेन्द्र सहनी सुल्तानगंज थाना के बालूघाट के रहने वाले हैं। पटना जिला नियंत्रण के आदेश पर वे काम कर रहे हैं। पटना आपदा विभाग की ओर से जब भी उन्हें चिट्ठी भेजी जाती है वे आ जाते हैं।

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नहीं मिलता है पैसा
राजेन्द्र सहनी ने बताया कि पटना जिला नियंत्रण की ओर से काम तो करा लिया जाता है लेकिन उसका पैसा नहीं दिया जाता। अभी भी उनका तीन से साढ़े तीन लाख रुपया बकाया है। खरमास मेला ड्यूटी और पितृपक्ष का भी पैसा नहीं दिया गया है। सहनी ने बताया कि वह लगातार डीएम के यहां जाते हैं पैसा मांगने के लिए। लेकिन पैसा नहीं मिलता।

Rohit Kumar

Founder- livebiharnews.in & Blogger- hinglishmehelp.com | STUDENT

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