बिहार ही नहीं ये है भारत का इकलौता गांव, यहां की महिलाओं को एक नहीं तीन बार मिला पद्मश्री

बिहार का मधुबनी जिला। मधुबनी जिला मुख्यालय से दस किलोमीटर दूर रहिका प्रखंड के नाजिरपुर पंचायत का जितवारपुर गांव आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। 670 परिवारों को अपने दामन में समेटे इस गांव का इतिहास गौरवशाली है। उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस गांव की तीन शिल्पियों को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।

देश के इतिहास में यह पहली मिसाल है जब एक ही गांव को तीन पद्मश्री मिले हों। यह देश का एक मात्र ऐसा गांव है, जिसने सबसे ज्यादा तीन पद्मश्री अपने नाम किए हैं।

जानिए कौन हैं ये महिलाएं…
डेढ़ रुपए में बिका करती थी बौआ देवी की पेंटिंग, आज लाखों में है कीमत
बौआ देवी की 12 साल की उम्र में शादी हो गई। ससुराल वालों ने साथ दिया इसलिए मधुबनी पेंटिंग बनाती रहीं। बौआ देवी बताती हैं कि 1970 में मुझे एक पेंटिंग का डेढ़ रुपया मिलता था। अब लाखों मिल जाते हैं। ससुराल आने के बाद जगदंबा देवी के साथ पेंटिंग बनाने लगी। बाद में घटनाओं को सुनकर उनके चित्र कैनवास पर बनाने लगी। अमेरिका के 9/11 आतंकी हमले के बाद बौआ देवी ने एक पेंटिंग में गगनचुंबी इमारत को कोबरा सांप से जकड़ा दिखाकर लोगों का दर्द उकेरा था, जो विश्व प्रसिद्ध रही।

सीता देवी की पेंटिंग से प्रभावित थीं इंदिरा
सीता देवी, सुपौल जिले में जन्मीं लेकिन अंतिम सांस ससुराल जितवारपुर में ली। इन्होंने जगदंबा देवी के साथ रहकर पेंटिंग कला को और निखारा। इनका काम अच्छा था इसलिए भास्कर कुलकर्णी ने प्रोत्साहित किया। इस दौरान वे बौआ देवी से भी मिले। पोते प्रभात झा ने बताया कि दादी के काम पर जर्मनी की एरिका स्मिथ सहित कई विदेशियों ने शोध किए। साल 2005 मेें इनका निधन हो गया। इनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, जापान आदि जगहों पर लगीं। इनकाे 1981 में पद्मश्री मिला।

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दूसरों के घर सजाकर चलाती थीं अपना घर
जगदंबा देवी, गांव की पहली महिला थीं जिन्हें पद्मश्री मिला। छोटी उम्र में शादी हो गई। संतान नहीं हुई, इसलिए अकेलापन दूर करने के लिए दूसरे के घरों को सजाया करती थीं। उनके भतीजे कमलनारायण बताते हैं कि लोगों के यहां जनेऊ, शादी, गृह प्रवेश पर घर-दरवाजों, दीवारों पर पेंटिंग बनाकर उन्होंने अपना घर चलाया। 1961-62 में अकाल के बाद भास्कर कुलकर्णी गांव आए। वे जगदंबा की चित्रकारी देख हैरान हो गए। इंदिरा गांधी के सांस्कृतिक सलाहकार पुपुल जयकर ने इनके काम को विख्यात किया। 1975 में पद्मश्री मिला। 1984 में निधन हो गया।

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