बिहार: आटा चक्की चलाने वाले की बेटी नेशनल हैंडबॉल टीम में हुई सलेक्ट, …जानिए

बिहार में प्रतिभावानों की कमी नही है, बिहार के युवा हर जगह अपना परचम अपने कार्यो की बदौलत लहराते रहे हैं। आज हम बात कर रहे है बिहार के नवादा जिले के खुशबू की।

दरसल नवादा में लड़कियों का बाहर निकलना आज भी आसान नहीं है लेकिन तमाम दिक्कतों के बीच खुशबू ने अपनी मेहनत और इच्छाशक्ति से नेशनल हैंडबॉल टीम में जगह बनाकर बिहार और भारत का नाम रौशन कर रही है।

गरीब मां-बाप की बेटी खुशबू पहले बैडमिंटन खेलना चाहती थी लेकिन गरीबी के कारण उसने हैंडबॉल खेलना शुरू किया और देखते ही देखते उसका राज्यस्तरीय टीम में सलेक्शन हो गया और आज वो नेशनल हैंडबॉल टीम की महत्वपूर्ण सदस्य है।

खुशबू बिहार की पहली हैंडबॉल खिलाड़ी हैं जो नेशनल महिला हैंडबॉल टीम के लिए सलेक्ट हुई है और बेहतर खेल का प्रदर्शन कर अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

पिता अनिल कुमार बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए गांव छोड़कर नवादा में रहने लगे और यही से खूशबू का सफर शुरु हुआ। अनिल प्रसाद खुद आटा मिल चलाते हैं। कम आय होने के बावजूद उन्होंने बेटियों को कभी कमी महसूस नहीं होने दी।

पुराने दिनों को याद करते हुए खुशबू ने बताया कि नवादा जैसे शहर में हैंडबॉल खेलना आसान नहीं था। सबसे पहले प्रोजेक्ट कन्या इंटर विद्यालय में 2009 से हैंडबॉल खेलना शुरू किया। छह महीने के अंदर टीम की सभी लड़कियों से आगे निकल गई। लेकिन आगे जाने के लिए हरिशचंद्र स्टेडियम में जाकर लड़कों के साथ प्रैक्टिस करना जरुरी था लेकिन घर से इसकी कतई इजाजत नहीं मिल रही थी। काफी रोया धोया तो फिर पैरेंट्स और परिवार के लोग मान गए और स्टेडियम जाकर प्रैक्टिस करने लगी।

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प्रैक्टिस के दौरान स्टेडियम में सारे लड़के होते थे और मैं एक सिर्फ लड़की थी लेकिन साथी खिलाड़ियों ने काफी सहयोग किया। स्टेडियम में अकेले प्रैक्टिस करते वक्त तरह तरह के कमेंट सुनने को मिलते थे लेकिन मैं कुछ करना चाहती थीं।

कई बार स्टेडियम से लौटने में देर होने पर पड़ोसी काफी कमेंट करते हैं जो पैरेंट्स को भी ठीक नहीं लगता था लेकिन इसके वाबजूद उनलोगों ने हमेशा साथ दिया। मैंने हार नहीं मानी और प्रैक्टिस करती रही। बढ़िया प्रदर्शन को देखते हुए 2009 में मेरा सलेक्शन राज्यस्तरीय टीम में हो गया। उसके बाद फिर 2015 में नेशनल हैंडबॉल टीम में सलेक्शन हुआ।

खुशबू 2015 में बांग्लादेश के चटगांव में, 2016 में बीच एशियाई गेम्स वियतनाम में जबरदस्त खेल का प्रदर्शन कर चुकी है। हाल ही में उज्बेकिस्तान के ताशकंद में एशियाई वुमेन क्लब लीग हैंडबॉल में भारत के लिए अच्छे खेल का प्रदर्शन कर छठे स्थान पर काबिज किया और खुशबू का अहम योगदान था।

मां प्रभा बताती है कि मोहल्ले और पड़ोस के लोग ताने मारते थे मगर अब वही लोग खुशबू की मम्मी के नाम से पुकारते है। बेटी और बेटों में कोई अंतर नही करना चाहिए। आज वो अपनी बेटी के नाम से जानी जाती है।

खुशबू का कहना है कि इस खेल में अभी भी महिलाओं की संख्या पूरे देश मे बहुत कम है और पुरुषों के साथ ही उन्हें प्रैक्टिस करना पड़ता है। आज भी मुझे बीएमपी (पटना) में लड़कों के साथ ही प्रैटिक्स करना पड़ता है। मेरी इच्छा है कि महिलाओं को सभी खेलों में बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए ताकि वो भी पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके।

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हैंडबॉल टीम में ज्यादातर लड़कियां हरियाणा और पंजाब की होती है। खुशबू की बड़ी बहन बीएसएफ में हैं और छोटा भाई बिजली विभाग में काम करता है। खुशबू का कहना है कि अगर नहीं खेलती तो कब की शादी हो जाती है और चूल्हा चौका में फंस जाती। पैैरेंट्स थोड़ा सपोर्ट करें तो बेटियां बेटों से ज्यादा रिजल्ट हमेशा देने में सक्षम हैं।

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