बाल विवाह रोकने के मामले में बिहार देश में सबसे आगे, …जानिए

नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे-4 (2015-16) के आंकड़ों के अध्ययन से पता चला है कि बाल विवाह को कम करने के मामले में बिहार सबसे आगे है। 2005-06 में 47.8 प्रतिशत के मुकाबले 2015-16 में यह घटकर 19.7 प्रतिशत रह गया है। जबकि देश के स्तर पर बाल विवाह की घटनाएं 2005-06 में 26.5 प्रतिशत के मुकाबले 2016-16 में घटकर 11.9 प्रतिशत रह गई हैं।

नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे-4 (2015-16) के आंकड़ों के अध्ययन से यह भी पता चला है कि बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने की घटनाएं शिक्षा के अधिकार के कम उम्र से जुड़ी हैं। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स एंड वालंटरी आर्गेनाइजेशन के अनुसार लगभग सभी राज्यों में राइट टू एजुकेशन की उम्र खत्म होते ही लड़कियों बाल विवाह की घटनाएं बढ़ जाती हैं। शिक्षा का अधिकार 6-14 साल के सभी भारतीय बच्चों को है। यह उम्र पार करते ही लड़कियों में बाल विवाह की घटनाएं तेजी से बढ़ जाती हैं।

मानवाधिकार के महासचिव अंबुज शर्मा ने भी शिक्षा के अधिकार को 8वीं क्लास से बढ़ाकर सेकेंडरी लेबल तक करने की वकालत की है। साथ ही मानवाधिकार आयोग लड़के और लड़कियों के विवाह की उम्र एक करने का सुझाव महिला और बाल विकास मंत्रालय को भेजने की तैयारी में है। करीब 140 देशों में लड़के और लड़कियों की शादी की एक ही उम्र 18 साल है। विधि आयोग ने भी पिछले महीने पूरे देश में सभी धर्मों के लिए शादी की उम्र 18 साल करने का प्रस्ताव रखा था।

नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे-4 से पता चलता है कि 15 से 19 साल के बीच की वे लड़कियां जिनकी शादी तय कानूनी उम्र से पहले हुई थी, उनमें 30.8 प्रतिशत कभी स्कूल नहीं गईं। जबकि 21.9 प्रतिशत ने प्राथमिक स्तर तक पढ़ाई की। सेकेंडरी लेवल तक पढ़ाई करने वाली ऐसी लड़कियां जिनकी शादी 18 साल से पहले हुई महज 10.2 प्रतिशत ही हैं। ऐसी लड़कियां जिनकी शादी उच्च शिक्षा के बाद भी 18 साल से पहले हुई मात्र 2.4 प्रतिशत है।

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रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि बाल विवाह की शिकार ज्यादातर लड़कियां जो 15-19 साल के बीच की हैं, उनमें 31.5 प्रतिशत मां भी बन चुकी हैं। बाल विवाह की शिकार लड़कियों मे एक चौथाई 15 से 16 साल के बीच की हैं।

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