बिहार में पौंड और बॉटम एश से भी बनाई जा सकेंगी ईंटें, …जानिए

बिहार में ईंट निर्माण के लिए वैकल्पिक उपायों की खोज हो रही है। इसके लिए फिलहाल फ्लाई एश के अलावा दो अन्य विकल्प पौंड एश और बॉटम एश की तलाश हुई है। इनसे भी ईंटें बनाई जा सकती हैं।

सूत्रों के अनुसार, इन दोनों विकल्पों से ईंट बनाने में कुछ तकनीकी दिक्कतें अभी सामने आई हैं। कुछ खर्च भी अपेक्षाकृत अधिक है पर भविष्य में जब भी मिट्टी की बनी लाल ईंटों का निर्माण बंद होगा तब इन्हीं विकल्पों का सहारा लेना पड़ेगा। पर्यावरण की रक्षा के लिए सरकार परंपरागत मिट्टी से बनी ईंटों के उपयोग को कम से कम करना चाहती है। इसके लिए विकल्प की भी तलाश है।

केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में विभिन्न थर्मल पावरों से फ्लाईएश का सालाना उत्पादन 73.8 लाख टन है। इनमें सीमेंट उत्पादन, खान की भराई, सड़क निर्माण आदि में मात्र 31.6 लाख टन की खपत होती है। वर्ष 2017-18 में ही 42.2 लाख टन फ्लाई एश बची गई थी। इनका उपयोग नहीं हो पाया था। एक ईंट बनाने में करीब 1.4 किलो फ्लाई एश लगती है। इस हिसाब से सिर्फ फ्लाई एश से 300 करोड़ ईंटों का निर्माण संभव है।

अभी मिट्टी से बनी ईंटों का सालाना उत्पादन दो हजार करोड़ है। फ्लाई एश से बनी ईंटों से कुल आवश्यकता की 15 प्रतिशत की आपूर्ति की जा सकती है। इसी प्रकार एनटीपीसी के अनुसार, राज्य में उपलब्ध पौंड एश और बॉटम एश की कुल मात्रा 738.57 लाख टन से अधिक है। इससे भी पांच हजार करोड़ ईंटें बनाई जा सकती हैं।

पढ़े :   बिहार की बेटी को मिला ह्यूमन अचीवर अवार्ड, ...जानिए

बॉटम एश
दरअसल यह थर्मल पावर प्लांट के ‘ब्यॉयलर’ की तलहटी में जमा होने वाले अवशिष्टों यानी राख को कहते हैं। ब्यॉयलर व इंसीमेटर में जले व जमा कोयले की राश के अंश के अलावा जले कुछ हेवी मेटल्स के अवशेष भी बॉटम एश में रहते हैं। ये अंश उच्च तापक्रम पर जलाने से पैदा हुई ऊर्जा से बनते हैं।

पौंड एश
यह पावर प्लांट में कोयले को उच्च तापमान पर जलाने से पैदा होता है। प्लांट के टरबाइन, ब्यॉयलर के वेस्ट प्रोडक्ट के रूप में इसे जाना जाता है। यह नरम व गीले रूप में होता है। जले कोयले के अलावा कुछ अन्य रसायनों के अवशिष्ट भी रहते हैं। पावर प्लांट के निकट ही बड़े-बड़े गड्ढों में इसे गाढ़े तरल रूप में जमा किया जाता है।

Leave a Reply