नवरात्र आज से, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच होगी कलश स्थापना

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि …नमस्तस्यै नमस्तैस्यै नमस्तैस्यै नमो नम:…मां दुर्गा का सोलहों कला के साथ आज से नवरात्र शुरू हो जाएगा।

नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को कलश या घट की स्थापना की जाती है। कलश को भगवान गणेश का रूप माना जाता है। हिन्दू धर्म में हर शुभ काम से पहले गणेश जी की पूजा का विधान है। इसलिए नवरात्र की शुभ पूजा से पहले कलश के रूप में गणेश को स्थापित किया जाता है। आइए जानते है कि नवरात्र में कलश कैसे स्थापना किया जाता है।

कलश स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएं:
· मिट्टी का पात्र और जौ
· शुद्ध साफ की हुई मिट्टी
· शुद्ध जल से भरा हुआ सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का कलश
· मोली (लाल सूत्र)
· साबुत सुपारी
· कलश में रखने के लिए सिक्के
· अशोक या आम के 5 पत्ते
· कलश को ढंकने के लिए मिट्टी का ढक्कन
· साबुत चावल
· एक पानी वाला नारियल
· लाल कपड़ा या चुनरी
· फूल से बनी हुई माला

नवरात्र कलश स्थापना की विधि:
नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता है वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए। लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग पूजा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

भविष्य पुराण के अनुसार कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध कर लेना चाहिए। एक लकड़ी का फट्टा रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछाना चाहिए। इस कपड़े पर थोड़े चावल रखने चाहिए। चावल रखते हुए सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करना चाहिए। एक मिट्टी के पात्र (छोटा समतल गमला) में जौ बोना चाहिए। इस पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करना चाहिए। कलश पर रोली से स्वस्तिक या ऊं बनाना चाहिए।

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कलश के मुख पर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए। कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखने चाहिए। कलश के मुख को ढक्कन से ढंक देना चाहिए। ढक्कन पर चावल भर देना चाहिए। एक नारियल ले उस पर चुनरी लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन पर रखते हुए सभी देवताओं का आवाहन करना चाहिए। अंत में दीप जलाकर कलश की पूजा करनी चाहिए। कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ाना चाहिए।

दुर्गासप्तशती पाठ से प्रसन्न होती हैं मां : दुर्गासप्तशती के पाठ से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं। पूरे विधि -विधान के साथ दुर्गासप्तशती का पाठ हर दिन किया जाना चाहिए। प्रतिपदा के दिन शाप विमोचन, कवच, कीलक और अर्गला, रात्रिसूक्त, नर्वाण मंत्र का जाप करना चाहिए। दूसरे दिन पहले अध्याय, तीसरे दिन दूस व तीसरा, चौथे दिन चौथे, पांचवें दिन पांच, छह, सात और आठवां अध्याय, छठे दिन नौवें व दसवें, सातवें दिन 11 वें अध्याय और 8वें दिन 12वें और 13वें अध्याय का पाठ करना चाहिए। नौवें दिन नर्वाण मंत्र का जाप,प्राधानिक रहस्य, वैकृतिक रहस्य, मूर्ति रहस्य,क्षमा प्रार्थना और कुंजिका स्रोत का पाठ करें। दसवें दिन हवन होगा।

मां दुर्गा के 108 नाम का जाप करें
दुर्गासप्तशती का पाठ न कर सकते हैं तो मां दुर्गा के 32 व 108 नाम का जाप करें।

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