यहां कटकर गिरी थी मां कात्यायनी की बाईं भुजा, चढ़ाते हैं दूध और गांजा

आपने शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं को भांग और गांजा चढ़ाते देखा-सुना होगा, लेकिन बिहार में एक देवी मंदिर ऐसा भी है, जहां अपनी मनोकामना पूर्ण होने की आस लिए श्रद्धालु देवी मां को भी दूध और गांजा चढ़ाते हैं।

खगड़िया-सहरसा रेलखंड के बीच धमारा स्टेशन के समीप प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां कात्यायनी स्थान में मां दुर्गा के कात्यायनी रूप की पूजा-अर्चना होती है।

क्या है मान्यता…
– कहते हैं मां पार्वती की बायीं भुजा यहीं कटकर गिरी थी। पौराणिक कथाओं के मुताबिक मां पार्वती के पिता राजा दक्ष द्वारा यज्ञ का आयोजन किया गया था।
– इस यज्ञ में सभी को बुलावा भेजा गया था। शिवाय भगवान शिव जी के। ऐसे में जब पार्वती यज्ञ में भाग लेने के लिए जा रही थी। तब भी भगवान शिव ने रोका था।
– बावजूद मां पार्वती यज्ञ में पहुंच गईं। बिना निमंत्रण के यज्ञ में मां पार्वती को देख कई लोगों ने तंज कसने शुरू कर दिए। इसे सुन मां पार्वती आत्मग्लानि महसूस करने लगी और यज्ञ में कूद गई।
– जब भगवान शिव को मां पार्वती के यज्ञकुंड में कूदने की जानकारी मिली तो वे वहां पहुंचकर मां पार्वती के जले शरीर को लेकर तांडव करने लगे। इसी तांडव में मां पार्वती का बांया हाथ कटकर इसी स्थल पर गिरा था।

क्यों चढ़ाया जाता है दूध व गांजा
इस मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन है। यहां दूध व गांजे के चढ़ावा की परिपाटी बहुत पुरानी है। कहते हैं श्रीपत महाराज नामक पशुपालक जब बियाबान में पशु चरा रहे थे। तब स्वयं देवी मां प्रकट होकर मंदिर की स्थापना करने को कहा था। अनसुना करने पर पशु की मौत व अन्य अनिष्ट कार्य होने की भी चेतावनी दी थी।

पढ़े :   छठ महापर्व से प्रभावित जापानी टूरिस्ट अगले साल सपरिवार आएंगी बिहार

इस मंदिर में स्थापित पिंड की खोज चौथम राज के राजा मंगल सिंह मुरार शाही और उनके मित्र श्रीपत महाराज ने की थी। इसके बाद यहां मंदिर का निर्माण कराया गया।

श्रीपत महाराज अहराइन गीत गाकर मां को खुश रखते थे। साथ ही प्रतिदिन दूध का चढ़ावा भी देते थे। श्रीपत महाराज गांजा के शौकीन थे। इसलिए वे दूध के साथ गांजा भी चढ़ाते थे। कालांतर से यह रिवाज कायम है कि पशुपालक दूध का पहला कतरा मां की भुजा पर चढ़ाते हैं।

शक्तिपीठ के पुजारी कहते हैं कि वैसे तो आम दिनों में भी यहां श्रद्धालु आते हैं, लेकिन हर सोमवार और शुक्रवार को यहां श्रद्धालु विशेष रूप से जुटते हैं। ऐसी मान्यता है कि सप्ताह में दो दिन देवी मां खुद मंदिर में आती हैं। लोग उन्हें ‘वैरागन’ कहते हैं।

यहां मां के मंदिर के अलावा शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और श्रीराधा-कृष्ण का मंदिर भी है। बाहर से आने वाले भक्तों के ठहरने के लिए धर्मशाला भी बनाई गई है।

Rohit Kumar

Founder- livebiharnews.in & Blogger- hinglishmehelp.com | STUDENT

Leave a Reply

error: Content is protected !!