बिहार के इस गांव में छठ की है अनूठी परंपरा, …जानिए

सूर्य उपासना का महापर्व छठ यूं तो महिलाएं ही ज्यादातर करती हैं, लेकिन बिहार के समस्‍तीपुर जिले के मोरवा प्रखंड की ररियाही पंचायत का रघुनाथपुर ऐसा अनोखा गांव है, जहां के 90 प्रतिशत पुरुष यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वे ही गांव के तालाब में अर्घ्‍य देते हैं। व्रत के हर नियम का पालन करते हैं। इसके पीछे की कहानी करीब 200 साल पुरानी है। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि दरअसल पर्दा प्रथा के कारण महिलाओं को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई। इससे वे गांव के तालाब पर छठ मनाने नहीं जा सकती थीं। ऐसे में यह संकट सामने आया कि छठ व्रत कौन करेगा?

वैसे समय में इस गांव के कुछ पुरुष सामने आए। उन्होंने व्रत रखना और गांव के तालाब में जाकर अघ्र्य देना शुरू किया। इसके बाद इनकी संख्या बढ़ती गई। आज पर्दा प्रथा तो खत्म हो गई, लेकिन यह जिम्मेदारी पुरुष अब भी निभा रहे हैं। हालांकि बदलते दौर में कुछ महिलाएं भी अब छठ करने लगी हैं। पांच हजार की आबादी वाले इस गांव में एक हजार से अधिक पुरुष छठ करते हैं।

अवकाश प्राप्त प्रधानाध्यापक रामनरेश सिंह कहते हैं, पुरुषों द्वारा छठ व्रत करने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। आज भी इसका निर्वहन हो रहा है। बुजुर्ग ग्रामीण परमानंद सिंह बताते हैं कि “पर्दा प्रथा के कारण महिलाओं को घर की इज्जत मानकर सम्मान देने की भावना रही है। इसी के चलते यह परंपरा है।

बेटी आकर करतीं है व्रत
पिंकी कुमारी कहती हैं कि पिता रमण सिंह अक्सर बीमार रहते हैं। वे छठ व्रत नहीं कर सकते, इसलिए उनके बदले वो हर साल दरभंगा से मायके ररियाही आकर छठ व्रत करती हैं।

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‘यहां अधिकांश पुरुष ही छठ व्रत करते हैं। अब इक्का-दुक्का महिलाएं भी व्रत करने लगी हैं। इसका असर पड़ोसी गांवों पर भी पड़ा है। जहां आज 50 प्रतिशत पुरुष छठ व्रत करते हैं।’
-फूलन सिंह, मुखिया, ररियाही (2017)

रघुनाथपुर में शुरू से ही गांव के पुरुष छठ करते आ रहे हैं। हालांकि महिलाओं को छठ करने की मनाही नहीं है। कभी किसी ने इसे लेकर कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं की। वैसे आस्था का महापर्व है, इसे कोई भी कर सकता है।’
-विद्यासागर निषाद, विधायक मोरवा विधानसभा क्षेत्र (2017)

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